पहले ये वायरल वीडियो देखिए…ये कोई फिल्मी सीन नहीं, ये आज़मगढ़ के जीयनपुर कोतवाली का असली मंजर है। नमस्कार मैं हूं वीर सिंह। दो ऐसी तसवीरें… जिन्होंने पुलिस की वर्दी पर कालिख पोत दी है! दो-दो वीडियो… दो-दो चेहरों पर थप्पड़… और सवाल करोड़ों का — क्या यही है जनता के रक्षक?”पहली वीडियो… थानेदार वर्दी में… और उसी वर्दी का नशा सिर चढ़कर बोल रहा है। सामने बुलाया गया शख्स… और अगले ही पल गूंजती है थप्पड़ों की आवाज़! न्याय के मंदिर में ये कैसा अपमान का मंजर? ये वीडियो कब का है? क्या मामला है? मार खा रहा ये युवक कौन है? उसका जुर्म क्या है?—इन सवालों के जवाब अभी तक राज़ हैं। लेकिन जो साफ दिख रहा है… वह दिल दहला देने वाला नज़ारा है— जहां साहब की मुट्ठी, कानून की किताब से ज्यादा ताकतवर साबित हो रही है। हां, वही ‘साहब’ जो दिन-रात जनता की रक्षा का दावा करते हैं, लेकिन कैमरे की आंख में कैद होकर अपनी ही वर्दी का मजाक उड़ा रहे हैं। जो तस्वीरें सामने आई हैं उसने सिस्टम पर सवाल जरूर पैदा कर दिया है।
पहला वीडियो: जीयनपुर कोतवाल —एक हाथ में मोबाइल, दूसरे हाथ से युवक पर थप्पड़ों की बारिश। युवक क्या करने आया था? ये साफ नहीं, लेकिन थप्पड़ों की ताकत ही बता रही है कि मामला बड़ा गंभीर है। थाने में बैठे लोग? बस मूक दर्शक बने बैठे हैं, जैसे कोई डरावनी फिल्म देख रहे हों। गुस्से की लहर में खुद कोतवाल साहब के तेवरों के आगे कोई खड़ा नहीं। युवक के बाल पकड़कर खींचते हुए अंदर ले जाते कोतवाल—ये दृश्य किसी ‘एक्शन थ्रिलर’ नहीं, बल्कि असली जिंदगी का क्रूर मजाक है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
दूसरा वीडियो सामने आता है—इस बार कोतवाल साहब पूरी “सिंघम स्टाइल” वर्दी में।
थाने में बैठे एक और युवक को बुलाते हैं, और फिर वही सिलसिला—थप्पड़ों की बरसात। साहब’ उसे ऐसे कूटते हैं, जैसे कानून की किताब ने अधिकार दे दिया हो। नज़ारा ऐसा मानो कोतवाली न होकर रामलीला का रावण वध हो।
कानून का दरबार जहाँ इंसाफ़ होना चाहिए था, वहाँ गूंज रही थी सिर्फ़ थप्पड़ों की गूँज। यानी नियम और इंसाफ़ की जगह अब सिर्फ़ हाथ की ताकत और “साहब का अंदाज़” चल रहा है।
दिल टूट जाता है सोचकर, कि ये वही जगह है जहां मदद की उम्मीद लेकर जाते हैं लोग, और लौटते हैं जख्मों के साथ।
अब ज़रा सोचिए—थाने के भीतर गालियों का इलाज थप्पड़ से, और बाहर छेड़खानी का फैसला बाल खींच-खिंचाई से। तो फिर IPC और CRPC की किताबें कूड़े में फेंक दीजिए, क्योंकि जीयनपुर में कानून की परिभाषा अब ‘साहब के थप्पड़’ है।
⚖️ कानून की किताब खोलें तो भारतीय दंड संहिता और पुलिस अधिनियम साफ़ कहते हैं—किसी भी नागरिक के साथ मारपीट करना, बिना कानूनी प्रक्रिया के, गैरकानूनी है। लेकिन जीयनपुर कोतवाली का ये नज़ारा दिखा रहा है कि कानून की चौखट पर भी कोई “अपनी ताकत” दिखा सकता है।
अब मज़ेदार बात ये है कि ये वीडियो किसी आम राहगीर या पत्रकार ने नहीं, बल्कि थाने के सीसीटीवी कैमरे ने कैद किए हैं।
यानी मामला सिर्फ़ गुस्से का नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर की दरारों का भी है। सीसीटीवी फुटेज का बाहर आना, दरअसल अंदर की बगावत का इशारा है।सोचिए, ये वही जगह है जहाँ अपराधी डरते हैं और नागरिक मदद की उम्मीद करते हैं।लेकिन जब खुद कोतवाल कानून तोड़े और अपनी “सिंघम शैली” दिखाएं, तो जनता का भरोसा और नागरिकों की सुरक्षा की उम्मीदें कहाँ जाएँगी?कानून का मतलब सिर्फ़ वर्दी और ताकत नहीं।कानून का मतलब इंसाफ़, प्रक्रिया और जवाबदेही है।
एसपी ग्रामीण चिराग जैन ने स्वीकार किया है कि वीडियो जांच के दायरे में है। उन्होंने कहा है— “जो भी तथ्य सामने आएंगे, उस पर कार्रवाई होगी। जांच सीओ को सौंपी गई है”
सुनिए—लेकिन अब जनता सवाल पूछ रही है— क्या सिर्फ जांच का ढोल पीटा जाएगा… या जनता को इंसाफ भी मिलेगा?
ये वीडियो सिर्फ थप्पड़ों की आवाज़ नहीं है… ये थाने की दीवारों के भीतर दबे विद्रोह की दस्तक है। अब देखना है कि आज़मगढ़ पुलिस इस दस्तक को सुनती है… या इसे भी दबा देती है!
जीयनपुर थाना आज कलम से नहीं, कैमरे से चर्चा में है।
और कोतवाल साहब… अब लोग उन्हें सिंघम नहीं, “बल्कि थप्पड़ बाज़ सिंघम ” कहकर याद करेंगे।
अब सुनिए उस पीड़ित की कहानी उसी की जुबानी
*आप देख रहे हैं सुपरफास्ट न्यूज़ जिला संवाददाता राम मिलन यादव की रिपोर्ट*
Author Profile
- अभिषेक मिश्रा (सदाशिव मिश्रा ) , प्रधान सम्पादक , मो. 7317718183
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