April 20, 2026
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# *बार-बार चुनावों का बोझ और जनता की आवाज़ – कवि अभिषेक मिश्रा का दमदार सन्देश…*

भारतीय लोकतंत्र के सबसे चर्चित प्रस्ताव “एक राष्ट्र, एक चुनाव” पर युवा कवि अभिषेक मिश्रा (बलिया, उत्तरप्रदेश), की कविता ने नई ऊर्जा और ताज़गी भर दी है। उनकी रचना “एक राष्ट्र, एक चुनाव – नई दिशा, नया सफ़र” में बार-बार होने वाले चुनावों की अव्यवस्था, जनता की थकान और विकास कार्यों पर पड़ने वाले असर को गहरे भावों के साथ प्रस्तुत किया गया है।

कविता केवल प्रश्न नहीं उठाती, बल्कि समाधान की ओर भी मार्गदर्शन करती है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि यदि सभी चुनाव एक साथ हों, तो समय, धन और संसाधनों की बड़ी बचत होगी, जनता को राहत मिलेगी और लोकतंत्र और सशक्त होगा।

अभिषेक मिश्रा की लेखनी ने इस जटिल विषय को सहज शब्दों में पिरोकर न केवल जनमानस को सोचने पर मजबूर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि साहित्य समाज और नीति-निर्माण के बीच एक सशक्त सेतु बन सकता है। यही कारण है कि उनकी यह रचना न सिर्फ़ पाठकों, बल्कि नीति-निर्माताओं को भी संवाद की नई राह दिखा सकती है।

*“एक राष्ट्र, एक चुनाव – नई दिशा, नया सफ़र”*

बार-बार चुनाव का शोर, कभी यहाँ, कभी वहाँ मतदाता की कतार,
कभी लोकसभा, कभी विधान सभा, कभी पंचायत, कभी नगर-पार,
हर बार घोषणा पत्र, हर बार नारा, हर बार रैली, हर बार प्रचार,
धन और समय का अपव्यय, अधूरी योजनाओं का बोझ अपार।

आचार संहिता लगते ही ठहर जातीं सड़कों की रफ़्तार,
रुक जाते विकास के काम, जनता कहती — “फिर चुनावी त्यौहार!”
नेता दौड़ते गाँव-गाँव, वादों का बक्सा खोल,
पर असली मुद्दे पीछे छूटते, जनता का विश्वास हो जाता डोल।

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अब सोचो ज़रा —
अगर एक ही बार सब चुनाव हो जाएँ,
तो कितनी राहत जनता को मिल जाए।
एक बार कतार, एक बार मेहनत, एक बार मतदान,
पाँच बरस चैन से काम, विकास का होगा सम्मान।

खर्च बचेगा अरबों-खरबों का,
समय बचेगा करोड़ों घंटों का,
सुरक्षा बल भी राहत पाएँगे,
लोकतंत्र के प्रहरी मुस्काएँगे।

जनता को भी मिलेगा आराम,
न हर साल झूठे वादों का इनाम।
सरकारें चलेंगी पूरे कार्यकाल,
न गिरने का डर, न टूटने का जाल।

पर साथ ही सवाल भी उठते हैं —
क्या सभी राज्यों को साथ लाना आसान होगा?
क्या संवैधानिक बदलाव तुरंत संभव होगा?
क्या छोटी सरकारें बड़ी सरकार के संग ताल मिला पाएँगी?
क्या जनता की स्थानीय आवाज़ कहीं दब तो न जाएगी?

लोकतंत्र का सौंदर्य है विविधता,
हर राज्य की अपनी नीति, अपनी स्थिति, अपनी सत्ता।
एकसाथ चुनाव में संतुलन कैसे बनेगा,
ये संशोधन किस राह से चलेगा?

फिर भी सपनों को सच करने का हौसला चाहिए,
क्योंकि नया भारत, नई व्यवस्था, नया क़ानून, नया साहस चाहिए।
“एक राष्ट्र, एक चुनाव” है नारा नहीं,
ये है लोकतंत्र को मज़बूत करने की एक गहरी सोच सही।

आओ मिलकर चर्चा करें, बहस करें, समाधान खोजें,
सवालों को अनसुना नहीं, बल्कि जवाब में उम्मीद बोएँ।
क्योंकि लोकतंत्र का भविष्य हम सबके हाथों में है,
निर्णय की डोर, जनता के साथों में है।

लेखक: अभिषेक मिश्रा “बलिया”

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अभिषेक मिश्रा (सदाशिव मिश्रा ) , प्रधान सम्पादक , मो. 7317718183
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